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मार्च 30 – प्रेम झुंझलाता नहीं है।
“वह अनरीति नहीं चलता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुंझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता.” (1 कुरिन्थियों 13:5).
क्रोध अक्सर हार की निशानी होता है. जो व्यक्ति क्रोध पर काबू पा लेता है, वही सच्चा विजेता होता है. जब आरोप लगाए जाते हैं, जब बेवजह दोष मढ़ा जाता है, जब किसी का मज़ाक उड़ाया जाता है या उसका अपमान किया जाता है—और यदि वह क्रोध के बजाय ईश्वरीय प्रेम से जवाब देता है, तो उसने उस परीक्षा पर विजय पा ली है. जो व्यक्ति प्रेम के द्वारा क्रोध पर विजय प्राप्त करता है, वह हर परिस्थिति में विजयी रहेगा.
एक स्त्री का विवाह एक कठोर और क्रूर व्यक्ति से हुआ था, जिसने उससे केवल उसकी संपत्ति के लिए विवाह किया था. एक सुबह, एक छोटी सी बात पर, उसने अपनी पत्नी को पीटा और गुस्से में घर से बाहर निकल गया. जब वह दोपहर में लौटा, तो वह यह देखकर हैरान रह गया कि उसके लिए बड़े प्रेम से भोजन तैयार किया गया था और उसके सामने परोसा गया था. उसकी पत्नी ने बड़े कोमल भाव से उसे बैठने के लिए आमंत्रित किया और बड़े यत्न से उसे भोजन परोसा.
उसने पूछा, “क्या मैंने आज सुबह तुम्हें बहुत ज़्यादा चोट पहुँचाई?” उसके पत्नी के उत्तर ने उसके हृदय को बेध दिया. उसने कहा, “आपने मुझे नहीं पीटा—आपने तो स्वयं को ही चोट पहुँचाई है. जिस दिन मैंने परमेश्वर के सम्मुख अपना हाथ आपके हाथ में सौंपा था, उसी दिन मेरा संपूर्ण अस्तित्व आपका हो गया था. और क्या पवित्र शास्त्र यह नहीं कहता, ‘पत्नी का अपने शरीर पर अधिकार नहीं, परन्तु पति का है’ (1 कुरिन्थियों 7:4)? आप ही वह ‘सिर’ हैं जो परमेश्वर ने मुझे दिया है. मैं आपकी हूँ. आप जो कुछ भी करें, इस संसार में मेरे पास प्रेम करने के लिए आपके सिवा और कोई नहीं है.”
जैसे ही उसने ये शब्द कहे, वह व्यक्ति फूट-फूटकर रो पड़ा. उस दिन के बाद से, उनका घर गहरे प्रेम की नींव पर पुनः निर्मित हुआ और सुदृढ़ बना. प्रेम ने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली.
क्रूस पर लटके हुए प्रभु यीशु की ओर देखिए. उन्हें कितने घोर अपमान, तिरस्कार और उपहास का सामना करना पड़ा. उन्हें कोड़े मारे गए, उन पर प्रहार किए गए, और उन्हें क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया. क्या वे क्रोधित हुए? बिल्कुल नहीं. इसके विपरीत, उन्होंने प्रार्थना की: “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं” (लूका 23:34). इसी प्रकार क्रोध पर विजय प्राप्त की जाती है.
प्रेम अनेक पापों को ढाँप लेता है. जहाँ पाप ढाँप लिए जाते हैं, वहाँ क्रोध या कठोरता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता. वहाँ झगड़ों या फूट के लिए कोई जगह नहीं होती. प्रेम ईश्वरीय रीति से शासन करता है.
इस संसार को छोड़कर जाने से पूर्व, यीशु ने अपने शिष्यों से बार-बार कहा, “एक-दूसरे से प्रेम करो.” वे स्वयं इस बात का एक उत्तम उदाहरण थे. उन्होंने कहा: “यह मेरी आज्ञा है, कि तुम एक-दूसरे से वैसे ही प्रेम करो जैसा मैंने तुमसे किया है” (यूहन्ना 15:12).
परमेश्वर के प्रिय लोगों, आइए हम प्रेम के द्वारा क्रोध और रोष पर विजय पाने का प्रयास करें.
मनन के लिए वचन: “प्रेम पड़ोसी की कुछ बुराई नहीं करता, इसलिये प्रेम रखना व्यवस्था को पूरा करना है॥” (रोमियों 13:10).
