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मार्च 28 – प्रेम कभी अनरीति नहीं चलता।
“वह अनरीति नहीं चलता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुंझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता.” (1 कुरिन्थियों 13:5).
प्रेम कभी भी ऐसा अयोग्य या शर्मनाक काम नहीं करेगा जिससे उसे दुख पहुँचे जो हमसे प्रेम करता है. सच्चा प्रेम प्रसन्न करने की कोशिश करता है, चोट पहुँचाने की नहीं. इससे हम पहचान सकते हैं कि सच्चा प्रेम क्या है और नकली क्या है.
यदि आदम और हव्वा ने सचमुच प्रभु के असीम प्रेम को संजोकर रखा होता, तो वे उनकी आज्ञा का उल्लंघन करके और वर्जित फल खाकर उन्हें दुखी न करते. प्रेम में आई कमी ही उन्हें पाप की ओर ले गई. यदि आकान ने सचमुच प्रभु और अपने अगुवा यहोशू से प्रेम किया होता, तो वह शर्मनाक तरीके से यरीहो की विजय के बाद उसमें से वस्त्र न चुराता. यदि यहूदा इस्करियोती ने उस प्रभु से गहरा प्रेम किया होता जो उसके लिए पृथ्वी पर आए थे, तो वह कभी भी शर्मनाक तरीके से मसीह को चाँदी के तीस सिक्कों के बदले न बेचता. प्रेम की विफलता ही उनके पतन की जड़ थी. आज भी, प्रेम की यही कमी कई विश्वासियों को गलत कामों की ओर ले जाती है—यहाँ तक कि रिश्वत लेने की ओर भी. परमेश्वर के प्रेम की रोशनी में अपने कामों की जाँच करें और उन्हें सुधारें.
जो पुरुष सचमुच अपनी पत्नी से प्रेम करता है, वह दूसरी स्त्रियों पर गलत नज़र नहीं डालेगा. जो पिता सचमुच अपने बच्चों से प्रेम करता है, वह उनकी शिक्षा और भविष्य के लिए रखे पैसे को बर्बाद नहीं करेगा. जो सचमुच प्रभु से प्रेम करता है, वह सांसारिक सुखों के पीछे भागकर उन्हें दुखी नहीं करेगा. प्रेम अशिष्ट व्यवहार नहीं करता.
प्रभु ने इफिसुस की कलीसिया के कामों को देखा. उन्होंने उनके परिश्रम और धीरज की सराहना की. फिर भी, एक कमी ने उनके हृदय को दुखी कर दिया. उन्होंने कहा, “फिर भी मुझे तुमसे यह कहना है कि तुमने अपना पहला प्रेम छोड़ दिया है.” उनकी दशा कितनी दुखद थी!
आज, बहुत से लोग सिद्धांतों के प्रति बहुत उत्साही दिखाई दे सकते हैं. वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि गलती करने वाले को बिना किसी दया के दंडित किया जाना चाहिए. उनकी मुख्य चिंता उन दूसरों की परीक्षा करना और उन्हें बेनकाब करना बन जाती है जो आध्यात्मिक अधिकार का दावा करते हैं. फिर भी ऐसे जोशीले लोगों से, प्रभु दुख के साथ कहते हैं, “तुमने अपना पहला प्रेम छोड़ दिया है.”
एक समय था जब परमेश्वर की उपस्थिति ही उनका आनंद थी. अब, दूसरों में दोष ढूँढ़ने से उन्हें संतुष्टि मिलती है. एक समय था जब परमेश्वर का वचन उन्हें खुशी देता था. अब, डाँट-फटकार भरे पत्र लिखना और दूसरों को कष्ट पहुँचाना उन्हें संतोषजनक लगता है.
परमेश्वर के प्रिय लोगो, त्याग की वह शुरुआती भावना कहाँ है? प्रभु के लिए कष्ट सहने की वह तत्परता कहाँ है? कलवरी का वह प्रेम कहाँ है?
मनन के लिए वचन: “सो चेत कर, कि तू कहां से गिरा है, और मन फिरा और पहिले के समान काम कर; और यदि तू मन न फिराएगा, तो मै तेरे पास आकर तेरी दीवट को उस स्थान से हटा दूंगा.” (प्रकाशितवाक्य 2:5).
